बागपत/ शुक्रवार, २१ जनवरी/ क्या टिका रहेगा सपा-रालोद गठबंधन? प्रत्याशियों की पहली सूची जारी होने के बाद से ही उठ रहे बगावत के स्वर

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में सियासी पारा नीचे आने का नाम नहीं ले रहा। विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद से ही सूबे की सियासत रोज एक नए रंग में नजर आती है। अब समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन की पहली सूची में मुस्लिमों को तरजीह देने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सियासी समीकरण गड़बड़ा गए हैं। इससे किसान और खासकर जाट गुर्जर समुदाय में नाराजगी है। इसको लेकर धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। कई जगह पर इस आग की आंच को महसूस भी होने लगी है। ऐसे में सपा अपने ही बुने जाल में फंसती हुई दिखाई दे रही है। सपा और आरएलडी की ओर से जारी की गई उनके गले की फांस बनती दिख रही है। कुछ समय पहले तक पश्चिमी यूपी में जो माहौल और समीकरण सपा के पक्ष में बनता दिखाई दे रहा था वह गठबंधन की सूची के साथ बिखरता जा रहा है और इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिल सकता है किसान और रालोद समर्थकों को उम्मीद थी कि जयंत चौधरी ज्यादा से ज्यादा जाट समुदाय और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट देंगे, लेकिन सपा-रालोद की पहली सूची में 29 में से 9 मुस्लिम समुदाय के प्रत्याशियों को मैदान में उतारने से जाटों और किसानों का बड़े तबके का गुस्सा सतह पर आ गया है। सपा-रालोद ने दिया झटका पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जानकारों का कहना है कि किसानों और जाटों को उम्मीद थी कि उन्हें सपा-रालोद टिकट में बड़ी हिस्सेदारी देंगे लेकिन 29 में 9 मुसलमानों को टिकट देकर गठबंधन ने उनकी उम्मीदों को झटका दिया है। सपा रालोद की घोषित हुई लिस्ट में 20 सीटों पर ब्राह्मण, ठाकुर, दलित, गुर्जर और जाट समेत अन्य ओबीसी जातियों को समाहित करने का प्रयास किया गया है। ऐसे में इन समुदायों को औसतन 3से 4टिकट मिले हैं। इसे किसान आंदोलन के दौरान किए वादे से मुकरने के तौर पर भी देखा जा रहा है। उस वक्त सपा-रालोद ने जाटों और किसानों से बड़ी हिस्सेदारी का वादा किया था, जो अब पूरा होता नहीं दिख रहा है। नाहिद हसन को लेकर भी है नाराजगी सपा के नाहिद हसन को लेकर भी जाटों में नाराजगी है। किठौर से सपा ने शाहिद मंजूर को उम्मीदवार बनाया है। मेरठ से सपा के रफीक अंसारी को टिकट दिए जाने से भी माहौल में गर्मी है। बागपत से रालोद के अहमद हमीद को उम्मीदवार बनाया गया, जबकि बागपत जाटों का गढ़ माना जाता है। हापुड़ जिले की विधानसभा सीट धौलाना में भी जाटों और किसानों की बड़ी संख्या है। जहां से सपा के असलम चौधरी को टिकट दिया गया है। इसी तरह से बुलंदशहर से रालोद के हाजी यूनुस स्याना से रालोद के दिलनवाज खान, कोल से सपा के सलमान सईद और अलीगढ़ से सपा के जफर आलम को टिकट दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत पर खास नजर रखने वाले कहते हैं कि प्रत्याशियों की पहली सूची को ध्यान से देखा जाय तो समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन में मुसलमान वोटों को अपने पक्ष में करने की छटपटाहट साफ नजर आती है। किसानों की अनदेखी कर रहा गठबंधन ऐसे में गठबंधन जाटों और किसानों की अनदेखी भी कर रहा है। प्रत्याशियों का चयन सपा-रालोद गठबंधन के लिए एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई साबित हो रहा है। कहीं गठबंधन की हालत ऐसी न हो जाए कि माया मिले न राम। वहीं बीजेपी अपने तौर पर स्पष्ट दिखती है। उसने टिकट बांटने में सभी वर्गों का ध्यान रखा है। साथ ही बीजेपी सरकार द्वारा पांच वर्षों में किए गए काम जनता के सामने हैं। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति पांच वर्षों में बहुत बेहतर हुई है। 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों को मुजफ्फरनगर आज भी नहीं भूला है। कैराना से सपा के नाहिद हसन का नाम आने से समाज में पड़ी दरार और चौड़ी ही हुई है। साथ ही गठबंधन की सूची में अपराधियों के जगह पाने वाले लोगों से भी बेचैनी बढ़ी है। आने लगी हैं विरोध की खबरें जो लोग पिछले पांच वर्षों से सुख-शांति जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उन्हें पांच साल पहले अपराधियों और माफियाओं के अत्याचार याद आने लगे हैं। यही कारण है कि किसानों और जाटों के गुस्से की तपन भी गठबंधन को महसूस हो रही है। जगह-जगह से विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं। ग्रामीणों और खासकर रालोद के समर्थकों के बीच से विरोध की खबरें आने लगी हैं। लोग सड़क पर आकर विरोध कर रहे हैं। ऐसे में सपा-रालोद गठबंधन की जो बढ़त दिखाई दे रही थी, वह अब तेजी से कम होती जा रही है और बीजेपी को स्वतः ही फायदा हो रहा है।

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