लखनऊ/ बुधवार, २१ जुलाई/ उर्मिल कुमार थपलियाल: अधूरी रह गई मराठी 'कथा'...नौटंकी को रंगमंच से जोड़ने वाला किरदार चला गया

लखनऊ वरिष्ठ नाटककार, व्यंग्यकार, संगीत नाट्य अकादमी और यश भारती सम्मान से अलंकृत डॉ.उर्मिल कुमार थपलियाल (80) का मंगलवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे। उन्होंने लखनऊ के इंदिरा नगर स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे अपने पीछे पत्नी वीना, बेटे रितेश और बेटी रीतुन को छोड़ गए हैं। उनके निधन की खबर सुन हर कोई स्तब्ध है। फिल्म अभिनेता और वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी ने बताया कि डॉ. थमलियाल आकाशवाणी में न्यूज रीडर थे। साल 1972 में दर्पण के संस्थापक बने। उन्होंने लगभग 95 नाटक किए। वह शहर से प्रकाशित होने वाले अधिकांश लोकप्रिय समाचारपत्रों में लिखते थे। 'हे ब्रेख्त' उनका आखिरी नाटक 19 जनवरी 2000 को मंचित हुआ था। उन्होंने आकाशवाणी में भी मंच की तर्ज पर नाटक रिकॉर्ड करवाने की परंपरा शुरू की। 'मराठी नाटक कथा का हिस्सा बनना चाहते थे'डॉ. अनिल रस्तोगी के अनुसार, 'डॉ. थपलियाल मराठी तीन पात्रीय नाटक 'कथा' का मंचन करना चाहते थे। मराठी समाज की ओर से इसका मंचन शहर में विक्रम गोखले ने किया था।' वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश ने बताया कि साल 1970 में डॉ. उर्मिल थपलियाल से पहली मुलाकात आकाशवाणी में हुई थी। उनके निर्देशन में सबसे पहला मंचित नाटक साल 1976 मे हयवदन देखा। पहले नाटक में उन्होंने संगीत को सबसे सशक्त रूप में नाट्य प्रस्तुति से जोड़ा। डॉ. थपलियाल की यादें साझा करते हुए राकेश ने बताया, 'उसका कारण यह रहा कि वह उत्तराखंड की लोक नाट्य शैली की रामलीला से गढ़कर आए थे। डॉ. थपलियाल की तमन्ना स्टील फ्रेम नाटक मंचन की भी थी, जो अधूरी रह गई। रेडियो स्टेशन के पास वाली चाय की दुकान में अक्सर उनके साथ बैठकी होती थी।' वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना ने बताया कि '70 के दशक में डॉ. थपलियाल के संपर्क में आए। उन जैसा उत्साही और बहुमुखी प्रतिभा का दूसरा कलाकार नहीं दिखा। मैंने उनके कई नाटकों के लिए सेट भी डिजाइन किए थे।' कलाकारों को गढ़ने वाले कुशल रंग प्रशिक्षक रंगकर्मी अमित दीक्षित बताते हैं कि उर्मिल जी से पहली मुलाकात साल 1995 में ओसीआर बिल्डिंग में हुई थी। उसके बाद उन्होंने 'हुइये वही राम रचि राखा' नाट्य प्रस्तुति में गाने का अवसर दिया गया। फिर साल काम करने का सिलसिला- मुख्यमंत्री सृष्टि, अबू हसन, शहीदों ने लौ जगाई जो, सूरज कहां से उगता है, ऑक्टोपस, कनुप्रिया सहित कई नाटकों तक चला। नौटंकी के रागों पर उनकी लिखी पुस्तक अमूल्य निधि है। आकाशवाणी में वह सोहन लाल थपलियाल के नाम से सेवाएं देते थे। वहीं रंगकर्म के क्षितिज पर वह उर्मिल कुमार थपलियाल के नाम से लोकप्रिय हुए। उत्तराखंड की रामलीलाओं में वह सीता का किरदार करते थे। वह कहते थे कि लोककलाएं प्रशिक्षण का महाविद्यालय हैं। व्यंग्य की मुहावरेदार भाषा के कुशल कलाकार थे व्यंग्यकार पकंज प्रसून के अनुसार, डॉ. थपलियाल के पास जैसी मुहावरेदार व्यंग्य भाषा थी वह कहीं और नहीं दिखती। उनके व्यंग्य लोगों को चमत्कृत करते थे। जैसे कि अगर आपका घर नरक है, तो समझ लीजिए कि स्वर्ग आपके पड़ोस में है।' अब जो सीमेंट में पौधे रोपेगा, उसे प्लास्टिक के फूल ही तो मिलेंगे। कानून व्यवस्था को लेकर लिखे एक व्यंग्य में वह कहते हैं- कानून के हाथ लंबे हो, यह तो ठीक है, मगर लोग-बाग यह भी चाहते हैं कि उसकी पकड़ कमजोर हो। वह लेखन मंच, संगीत वगैरह सभी पक्षों पर इतना वृहद मंथन करते थे कि प्रस्तुति स्वत: यादगार बन जाती थी। डॉ. उर्मिल थपलियाल को वर्ष 2013 में अट्टाहास शिखर सम्मान से नवाजा गया था।

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