आगरा/ शुक्रवार, २१ जनवरी/ सबकी नजर दलित वोट बैंक पर, अपने-अपने तरीके से लुभाने में जुटे राजनीतिक दल

लखनऊ: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) की दलित के यहां भोजन करने की फोटो वायरल होती है और चर्चा का विषय बन जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह समेत बीजेपी के कई बड़े नेता भी ऐसा करते रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी इसमें पीछे नहीं हैं। वहीं, सपा मुखिया अखिलेश यादव ने पहली बार समाजवादी आंबेडकर वाहिनी का गठन कर दिया है। वह आंबेडकर जयंती पर अयोध्या की तरह दलित दीपावली मनाने का ऐलान कर चुके हैं। इसी तरह हाथरस कांड के एक साल पूरा होने पर अखिलेश अपने कार्यकर्ताओं से हर महीने की 30 तारीख को हाथरस की बेटी का स्मृति दिवस मनाने के लिए कह चुके हैं। बीएसपी प्रमुख मायावती का तो कोई भाषण दलितों के हक की बात के बिना पूरा ही नहीं होता। वह दलित महापुरुषों के मान-सम्मान की बात करने के साथ खुद को भी दलितों के सम्मान से जोड़ती हैं। यूपी विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election) के समय सभी पार्टियों के दलित प्रेम की वजह साफ है। वह है पिछड़ों के बाद सबसे ज्यादा आबादी इसी वर्ग की है। हर कोई अपने-अपने तरीके से उन्हें लुभाने की कोशिश में लगा है। आजादी से पहले हुई दलित चेतना की शुरुआतराजनीति में दलित चेतना की बात करें तो इसकी शुरुआत आजादी से पहले ही हो चुकी थी। 19वीं सदी की शुरुआत में श्री नारायण गुरु स्वामी ने केरल में ब्राह्मणों के बनाए नियमों को तोड़ते हुए एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया। इसके बाद 1930 के दशक में स्वामी अच्युतानंद ने दलित चेतना के लिए बड़ा अभियान चलाया। वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान के जरिए दलितों को कई अधिकार दिलवाए। भारतीय राजनीति में एक नारा बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाने के लिए दिया गया, जो काफी चर्चित हुआ। 'जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जाएगी इंदिरा गांधी' नारा लगा भी खूब और जनता पार्टी की सरकार भी बनी, लेकिन जगजीवन पीएम नहीं बन सके। जनता पार्टी में पीएम पद के तीन दावेदार थे, चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई और जगजीवन राम। जब मोरारजी पीएम बने तो दलित समुदाय में काफी रोष आ गया। कहा जाता है कि उस समय देश में कई दलितों के घरों में खाना नहीं बना था। दलितों में पनपे इस रोष को आगे बढ़ाया कांशीराम ने। उन्होंने भी शुरुआत दलित चेतना के आंदोलन से की। उन्होंने दलितों के साथ अतिपिछड़ा वर्ग को भी साथ जोड़ा। सरकारी दफ्तरों में इन वर्गों के संगठन बनाए। इसके बाद 1984 में बहुजन समाज पार्टी बनाई। जानकारों का कहना है कि आंबेडकर की विचारधारा को जमीन पर उतारने का काम कांशीराम ने किया और मायावती ने उसे आगे बढ़ाया। खासकर उत्तर भारत तक इसका असर दिखा। दलित जातियां और प्रभावदेश में जाति आधारित जनगणना तो होती नहीं है, लेकिन दावों के अनुसार लेकिन भारतीय लोकतंत्र में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी ओबीसी समुदाय की है। इसके बाद सबसे ज्यादा संख्या दलितों की है। माना जाता है कि दलित वोटर 22% हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा 55% के करीब जाटव हैं और 45% गैर जाटव। दलितों की कुल 66 उपजातियां हैं। इनमें से 55 का संख्या बल ज्यादा नहीं हैं। कुछ जिले दलितों के प्रभाव वाले हैं। जाटवों का प्रभाव आगरा, आजमगढ़, जौनपुर, बिजनौर, सहारनपुर, गोरखपुर, गाजीपुर में देखने को मिलता है। वहीं, सीतापुर, रायबरेली, हरदोई, प्रयागराज और लखनऊ में पासी, बरेली, सुलतानपुर, गाजियाबाद में कोरी, धोबी जातियों की संख्या ज्यादा है। जिसकी आरक्षित सीटें, उसकी सत्ताप्रदेश में 403 में 86 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। पिछले कुछ चुनावों को देखों तो साफ है कि इन पर जिसका कब्जा हुआ, उसी को यूपी की सत्ता मिली है। 2007 में बीएसपी ने 62 रिजर्व सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। उस समय सपा के खाते में 13, भाजपा के खाते में 7 और कांग्रेस के खाते में 5 रिजर्व सीटें आई थीं। 2012 में सपा ने 58, बीएसपी ने 15 और बीजेपी ने 3 रिजर्व सीटों पर जीत हासिल की थी और सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। 2017 में बीजेपी ने 78 आरक्षित सीटों पर कब्जा कर सरकार बनाई। उसकी सहयोगी सुभासपा को 3 और अपना दल को 2 सीटों पर जीत हासिल हुई। बीएसपी के खाते में सिर्फ 2 सीटें रह गईं। दलित वोट बैंक में सेंधमारी का खेलदलित वोट का ट्रेंड जानें तो हम कह सकते हैं कि वह कई बार इकट्ठा हो जाता है तो कई बार गैर जाटव और जाटव में बंट जाता है। जाटव के साथ गैर जाटव जब तक बीएसपी के साथ रहा, तब तक वह फायदे में रही। बीजेपी ने पिछली बार जिस तरह गैर यादव ओबीसी को अपने पाले में किया, उसी तरह गैर जाटव को जाटव से अलग करके ही अपनी जीत तय की। रिजर्व सीटों पर बीजेपी ने 2017 में 65 गैर जाटव को टिकट दिया। यही वजह है कि इस बार मायावती का फोकस रिजर्व सीटों पर ज्यादा है। बसपा तभी ये सीटें निकाल सकती है, जब जाटव के साथ कुछ अन्य जातियों का भी वोट मिले। ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने सभी रिजर्व सीटों के लिए सभाएं कीं। वहीं, जाट, मुसलमान और अतिपिछड़ा प्रभारियों के साथ मायावती ने लगातार बैठकें की हैं। विभिन्न पार्टियों में दलित नेताइस समय प्रदेश में दलित नेताओं की बात की जाए तो बसपा प्रमुख मायावती सबसे बड़ी नेता के तौर पर सामने आती हैं। वह प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री हैं और चार बार इस पद पर रही हैं। इसके अलावा किसी भी पार्टी के पास इतना बड़ा चेहरा नहीं है। हालांकि, बीएसपी में दलित नेताओं की एक लंबी लिस्ट है, लेकिन मायावती के नाम के आगे वे उभर नहीं पाते। भाजपा के पास सुरेश पासी, रमापति शास्त्री, गुलाब देवी और कौशल किशोर जैसे नेता हैं। इसके अलावा विनोद सोनकर हैं, जो भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के पास पीएल पुनिया, आलोक प्रसाद, कमल किशोर, भगवती चौधरी, राधेश्याम कनौजिया जैसे नेता हैं। वहीं, चंद्रशेखर आजाद की अपनी अलग आजाद समाज पार्टी है। समाजवादी पार्टी में अवधेश प्रसाद, सुशीला सरोज, ऊषा वर्मा, अनिल दोहरे, इंद्रजीत सरोज जैसे नाम हैं। प्रफेसर पवन मिश्र, समाज शास्त्र विभाग, एलयू कहते हैं कि आजादी के पहले ही दलित चेतना का अभिर्भाव हो चुका था और यह चेतना राजनीति में अहम भूमिका निभाने को तैयार हो चुकी थी। ईवी रामास्वामी नायकर ने तमिलनाडु में स्वाभिमान आंदोलन चलाया। डॉ. आंबेडकर का प्रभाव उत्तर भारत तक पड़ा। उस विचारधारा को जमीन पर कांशीराम ने उतारा। उन्होंने 1989 में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ा। जातिगत राजनीति के संबंधों को विकास के लिए घातक माना जाता है। दलित राजनीति का सकारात्मक पक्ष भी है। इन जातियों के राजनीतिक उत्थान में एक सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला। कोई भी लोकतंत्र सबकी भागीदारी के बिना मजबूत नहीं हो सकता। यह बीएसपी के उभार के बाद ही संभव हुआ। पिछले कुछ चुनावों से यूपी की राजनिति में हिंदुत्व का समीकरण दलित राजनीति पर भारी पड़ रहा है। दलित नेतृत्व नेपथ्य में दिख रहा है। यह अलग बात है कि दलितों की अहमियत राजनीति में कम नहीं हो रही। सभी दलों में दलित नेताओं को आगे करने और वोटरों को लुभाने की होड़ है। राजनीति शास्त्री प्रफेसर एसके द्विवेदी के अनुसार दलितों का सबसे बड़ा वर्ग है जाटव। अब भी बीएसपी प्रमुख मायावती का इस वर्ग पर प्रभाव सबसे ज्यादा है। इस चुनाव में मायावती ने अपने पत्ते जल्दी नहीं खोले हैं, लेकिन ऐसा कहना कि बीएसपी खत्म हो रही है, एक बड़ा भ्रम होगा। यह देखना होगा कि वह जाटव वोट ही पाती हैं या अन्य जातियों को भी जोड़ पाती हैं। यही वजह है कि दूसरे दल गैर जाटव को अपनी ओर करने और मायावती के वोट बैंक में सेंधमारी के लिए प्रयासरत रहते हैं। दलित एक बड़ा वोट बैंक है और वह निर्णायक भी होता है। रिजर्व सीटों की अपनी अहमियत है। उसमें दलितों के साथ दूसरी जातियों को जोड़कर जीत हासिल होती है। जो दलित वोटों के साथ अन्य जातियों को जितना जोड़ पाता है, उतना ही फायदे में रहता है।

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